December 14, 2008

जिन्दगी तबाह हो गई

जिन्दगी तबाह हो गई


जिन्दगी तबाह हो गई सिसकियों की बारिश में
ना मिला मंजिल का पता गुलशन की गलीयारी में।
बाग्वाँ ही नाखुश है वादियाँ कुम्ह्ललायी है
फस्ले-बहार आये तो कैसे पतझड़ की साजिश में।
झाँका जो दिल के दर्पण में दिये जल रहे या नहीं
कब की बुझ चुकी थी चराग मजारों की रंजिश में।
सितमगारों की बस्ती जशन मना रही थी इधर
उधर दीवानों की दूनियाँ उजड़ रही थी वफाओं की सोजिश में।
एक तरफ लंतरानियों की बारिश एक तरफ मेहरबानियों की बारिश
जज्बात जलते नजर आये उल्फत की नशिली खलिश में।
जल के भी गर शुकूँ मिलता तो कोई बात होती
बेकरारी बढ़ ही गये ‘बसंत’ के अदावत की आतिश में।


गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
Email ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com/

1 comments:

Shashwat Shekhar said...

झाँका जो दिल के दर्पण में दिये जल रहे या नहीं
कब की बुझ चुकी थी चराग मजारों की रंजिश में।

waah bahut khub....