July 27, 2014

***khali Dil***

♡♡♡

Ye shahar ab sunsaan lgta hai,

har shakhs yaha preshan lgta hai....

Tanhayion ke toofan ne raunda is kadar,

ki ye jindgi ab shamshan lgta hai.....

♡♡♡♡♡
★★★

Kuch ummed baki hai....sath dogi tum mera

hunga preshan jb v.....

Himmat dogi.....

Lekar hatho me hath mera.

★★★
♥♥♥ waqt ki ek ek pal me yaad aati ho tum,
♥♥♥sanso ki hr lahar ko chhu jati ho tum,
♥♥♥dhalte hai din nikalte hai taare,
♥♥♥chand ke chehre me muskurati najar aati ho tum★★★

January 9, 2014

Namaskar  Delhi me AAP ki sarkar ne bargaining khatam krne ke liye Helpline number start kiya hai-- 011127357169hindyugm.com
Namaskar  Delhi me AAP ki sarkar ne bargaining khatam krne ke liye Helpline number start kiya hai-- 011127357169

September 21, 2012

                  हाले दिल पूछने में भी  शर्म आने लगी है उन्हें ,
अपने भी पराये लगने लगी है उन्हें ;
चमन सुनाये किसे हाले दिल अपना ,
वो तो गैरों की महफ़िल में जाने लगी  है .

February 17, 2012

मै हूँ एक इंसां


दिल की हसरत दिल में ही रही
लेकिन मैंने किसी से कुछ कहा नहीं ।
जब भी जिस को चाहा
अपनी चाहत का इज़हार किया नहीं ।
जिसके भी साथ चला
उसने कभी मुझे समझा ही नहीं ।
मै हूँ एक इंसां
मेरे दर्द की कोई दवा नहीं ।

कभी गैरों ने कुचला तो कभी अपनों ने
वक्त ने किया मुझपे कई प्रहार।
पर मै कभी रोया नहीं।
बारिश के बुलबुले की तरह
दर्द मेरे दिल में ही रही ।
मेरा दर्द किसी को दिखा नहीं
मै हूँ एक इंसां
मेरे दर्द की कोई दवा नहीं ।

December 23, 2011

अन्ना और आज की राजनीती

समाजसेवी अन्ना हजारे जी जिस लोकपाल बिल की बात कर रहे है आज के भ्रष्ट नेता और संसद कभी भी सही लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने की हिम्मत नहीं कर सकते है . अगर सरकार केंद्रीय जाँच आयोग को लोकपाल के हवाले कर देती है तो आये दिन कोई ना कोई नेता हवालात की हवा खाते नजर आयेंगे । वर्तमान राजनीती में कोई ऐसे चेहरे नहीं है जो दिलो-दिमाग से लोकपाल बिल से सहमत हो । सरकार डरी हुई है अन्ना हजारे को मिले जन- समार्थ्हन से। सरकार अगर सही लोकपाल बिल पारित करवा दे तो वह सरकार , सरकार नहीं बल्कि जन-सेवक बन के रह जाएगी। सही मायने में तभी हम भारतीय सही तरह से लोकतंत्र की परिभाषा को सार्थक कर पाएंगे ।

December 6, 2009

BIHARI PAR JULM

Aakhir ye kaisa loktantra hai jaha ke her nagrik ko BHASHA aur AREA ke aadhar par bata ja raha hai. sabhi jagah BIHARI ka apman ho raha hai. roj kahi na kahi us par julm dhaye ja rahe hai aur hamari CONGRESS GOVERNMENT gunga aur andha banke sirf kathputli bankar rah gai hai. Agar sarkar ke pass koi upaya nahi hai to tatkaal LOKSABHA BHANG karwane ka mai Manniya President Srimati Pratibha Devi Singh Patil se darkhwast karta hu.

October 17, 2009

दिवाली मुबारक
आया मौसम फिर दिवाली का
आया मौसम फिर दिवाली का
खुशियाँ मना रहे अजीजों सारे
घर आए उनके चाँद सितारे,
किंतु आँगन मेरे घर का देखो, है अब भी सुना-सुना सा।
आया मौसम फिर दिवाली का॥
अंधकार कर रही करुण क्रंदन
गली-गली हो गयी रौशन,
किंतु देखो पथ पे मेरे, जमा हुआ है महफिल तम का
आया मौसम फिर दिवाली का॥
लौ दीपक की हिलोरें ले रही
अखिल विश्व को बधाई दिवाली की दे ,
जगमगाता जग का आलम, मायूशी मेरी , न दूर कर सका।
आया मौसम फिर दिवाली का॥
कवि : बसंत लाल 'चमन'
E-mail ID : gulbdan@gmail.com

December 15, 2008

है कितनी उदासी मेरी हस्ती में

है कितनी उदासी मेरी हस्ती में

है कितनी उदासी मेरी हस्ती में
फिर भी खुशियों का ज़शन मनाता हूँ ;
पल-पल ठोकरें खा के भी
गमें-बहार को गले लगाता हूँ ।
याद आती है जब उसकी रुसवाई
जी भर के रोता हूँ ;
जब कटती नहीं तन्हाई
तो सुकूनत का गीत गुनगूनाता हूँ ।
पल-पल ठोकरें खा के भी
गमें-बहार को गले लगाता हूँ ।
बुलाती है जब कभी वो सपने में
दिल तार-तार हो जाता है ;
फैलाती है दामन जब अपना
बाँहों के बन्धन में बाँद्य लेता हूँ ।
पल-पल ठोकरें खा के भी
गमें-बहार को गले लगाता हूँ ।



कवि : बसंत लाल ‘चमन’
E mail ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com

December 14, 2008

जिन्दगी तबाह हो गई

जिन्दगी तबाह हो गई


जिन्दगी तबाह हो गई सिसकियों की बारिश में
ना मिला मंजिल का पता गुलशन की गलीयारी में।
बाग्वाँ ही नाखुश है वादियाँ कुम्ह्ललायी है
फस्ले-बहार आये तो कैसे पतझड़ की साजिश में।
झाँका जो दिल के दर्पण में दिये जल रहे या नहीं
कब की बुझ चुकी थी चराग मजारों की रंजिश में।
सितमगारों की बस्ती जशन मना रही थी इधर
उधर दीवानों की दूनियाँ उजड़ रही थी वफाओं की सोजिश में।
एक तरफ लंतरानियों की बारिश एक तरफ मेहरबानियों की बारिश
जज्बात जलते नजर आये उल्फत की नशिली खलिश में।
जल के भी गर शुकूँ मिलता तो कोई बात होती
बेकरारी बढ़ ही गये ‘बसंत’ के अदावत की आतिश में।


गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
Email ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com/

December 13, 2008

हाय दोस्त ! तूने यह क्या किया

हाय दोस्त ! तूने यह क्या किया


हाय दोस्त ! तूने यह क्या किया ;
चराग-ए-रौशन कर मज़ार-ए-कब्र कर दिया !
तूने क्या इसका अंजाम सोचा था ;
हाल-ए-दिल छुपाकर बदनाम कर दिया !
मुझे क्या गरज थी कि तेरे इस पैगाम का ;
पराये सर को उठाकर सरेआम कर दिया !
‘बसंत’ ही इक मर्ज़ नहीं था उस जुल्मों-सितम का ;
फिर उसे ही सरेशाम क्यों कत्लेआम कर दिया !
हाय दोस्त.............................................



गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
E mail ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com

December 12, 2008

उम्मीद नहीं अब उल्फत की

उम्मीद नहीं अब उल्फत की


अपनों की दुनिया से दूर कहीं
मर जाऊँ मिट जाऊँ ।
तार-तार हुए जीवन के
पार कहीं चला जाऊँ ।।
तारिकियाँ गहरी है इतनी
नभ मे तारे हैं जितनी ;
अनंत व्योम के आँगन से
अम्बर पे बलि जाऊँ ।
तार-तार हुए जीवन के
पार कहीं चला जाऊँ ।।
कदम-कदम पे चोटें खाके
लालसाएं हुए वारे-न्यारे ;
त्योरि के तेवर को अब
जब्त नहीं कर पाउ ।
तार-तार हुए जीवन के
पार कही चला जाऊँ ।।
उम्मीद नहीं अब उल्फत की
मुख मोड़ लिये अपने प्यारे ;
वापस आउँ अगर जमीं पे
सारे सितारे संग लाउँ ।
तार-तार हुए जीवन के
पार कहीं चला जाऊँ ।
अपनों की दुनिया से दूर कहीं
मर जाऊँ मिट जाऊँ ।।



गीतकार : बसंत लाल ‘चमन’
E mail ID: gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com/

December 11, 2008

बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए

बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए
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बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!
हालात पे अपनी यूँ रोते हुए!
बाल सारे पके हुए
गात पिचके हुए
दॉंत झर गए एक-एक कर
रुखे-रौशन है अपनी कुम्ह्लाये हुए
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!

ऑंखें हैं धँसी हुई
आवाजें फटी हुई
एक-एक पसली नजर आ रही
जैसे खड़े हो कोई तीर-कमान लिये हुए!
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!
पैरों में दम कहॉं
दो डग चल सके
हाथों में हिम्मत कहाँ
लाठी भी संभल सके
जिंदगी के रंगमंच से ठुकराए हुए
बुढ़ापे का दामन संभाले हुए!

मुमकिन नहीं देखना दिवा-रोशनी में भी
नैनों का नुर कहॉं गायब हुई
कह नहीं सकता कोई!
हालात पे अपनी यूँ रोते हुए
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!
हँसे कोई या कोई रोए
ताल्लुकात नहीं किसी से
दुत्कार दिया जब जिगर के टुकड़े ने
क्या नेह लगाउँ गैर किसी से
आहे निकलती दिल से रोते हुए
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!
दुर्भाग्य बुढ़ापे का
मौत भी रु-ब-रु नहीं होती
बियाबान हुए जग में
साया भी साथ नही देती!
मुझे मेरे हाल पे छोड़ने वालों
तेरी दुनियॉं सदा आबाद रहे
तेरी दुनिया सदा आबाद रहे
जा रहा हूँ जीते जी अलविदा कह्ते हुए
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!
हालात पे अपनी यूँ रोते हुए
बुढ़ापे का दामन सम्हाले हुए!


कवि : बसंत लाल ‘चमन’
E-mail ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com



December 10, 2008

पिला दिया है....

पिला दिया है....

पिला दिया है जी से ज्यादा सयानी साकी ने ;
लड़खड़ाते पाँव को भी सम्भाली साकी ने ।
दिया सहारा बाँहों का पिलाना ना छोडी़ ;
अजनबी आँखों से विषपान करायी साकी ने ।
तकिया बना के जानू को सजायी सेज आँचल का ;
जूल्फों की ओट से लबपान करायी साकी ने ।
रुख-रुख से मिलते रहे तमन्ना जवाँ होते रहे ;
तीश्ना ना मिटी मन की तो सुधापान करायी साकी ने ।
यारों ये सुनहरी शाम ना गुजारी कभी मैंने ;
रहेगी याद सदा ये जाम जो पिलायी आज साकी ने ।


गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
E mail ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com

December 9, 2008

तबियत ठीक नहीं है.....

तबियत ठीक नहीं है.....


तबियत ठीक नहीं है;
तुम आ जाती तो दिल बहल जाता ।
नजरें पथरा गयी है
होंठ भी शुष्क हो गये हैं;
काश ! तुम चूम लेती तो दिल ये बहल जाता ।
तबियत ठीक नहीं है;
तुम आ जाती तो दिल ये बहल जाता ।
पलकें झपकने लगी है
त्वचा भी खुश्क-खश्क सी हो गयी है;
गर तुम हाथ फेर देती तो दिल ये बहल जाता ।
तबियत ठीक नहीं है;
तुम आ जाती तो दिल बहल जाता ।
नींद आगोश मे ले रही है
क्या अजीब सी नशा छा रही है;
इक बार सिरहाने आ जाती तो ‘बसंत’ बहल जाता ।
तबियत ठीक नहीं है;
तुम आ जाती तो दिल बहल जाता ।


गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
Email ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com

December 8, 2008

कहर है क्यूँ बरपा.......



कहर है क्यूँ बरपा.......


कहर है क्यूँ बरपा, शहर भर में;
चर्चा हो गई है आम, शहर भर में ।
कूदरत का करिश्मा है या, आखिरत का अंजाम है;
शोला सी है या शबनम सी, फैल गई शहर भर में;
चर्चा हो गई है आम, शहर भर में ।
मौसम है ये खिज़ाँ का, सज़ा है बेदर्द जुबाँ का;
फस्ले-बहार लेके आ गयी है, शहर भर में;
चर्चा हो गई है आम, शहर भर में ।
अंगड़ाई लेती है तो शहर आहें भरती है;
मस्ती सी छा गयी है, शहर भर में;
चर्चा हो गई है आम, शहर भर में ।
ना अजाब का ख्याल है, ना शबाब पे मलाल है;
खुशबू महक उठी है बदन की, शहर भर में;
चर्चा हो गई है आम, शहर भर मे ।

गज़लकार : बसंत लाल ‘चमन’
Email ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com/




December 7, 2008

आधी-अधूरी जिन्दगी

आधी-अधूरी जिन्दगी

आधी-अधूरी जिन्दगी
बेबस और लाचार
पल्लवित होगा कोई कली
दीखता नही आसार।
बेमुरौवत सी हो गई
अपनी सुनी संसार
हर छण रोता हूँ साथी
होके जार-बेजार।
अपना कहने वाले सबने
धोखे दिये हजार
गूँचे खिल ना पाये कोई
उजड़ गया गुलजार।
आधी-अधूरी जीवन नैया
डूब रही मझधार
नाते सब टूट चुके पहले ही
कौन कराएगा पार?
कौन कराएगा पार?

कवि : बसंत लाल ‘चमन’
E mail ID : gulbdan@gmail.com
Website : http://nagmechaman.blogspot.com/

November 23, 2008

जीवन का अंतिम पड़ाव

दिल में आह लिए
पनाह की चाह लिए
हमशक्लों की भीड़ में
अनजान सड़क पे
भटकता एक मुसाफिर।
जीवन के अंतिम पड़ाव
पर पहुंचा पथिक
देह में दम नहीं
न आँखों में नूर कहीं
मांशपेशियों का नाम नहीं
कंकाल सी साया बनकर
अनजान सड़क पे
भटकता एक मुसाफिर।

थी आराम की शख्त जरुरत
अपनों संग गुजारता आखिरी हसरत
वह क्यों जा रहा सफर पे?
वह क्यों रो रहा बिफर के?
मंजिल का कोई पता नहीं
शुन्य आँखों से
अनंत अम्बर को निहारता
अनजान सड़क पे
भटकता एक मुसाफिर।

अरमाएं संजोएँ थे कितने
दिल के टुकड़े से
सींचा था जिस खून को
दर्द कितने सह-सह के
तोतली बोली जिसका कल
मन आह्लादित करता था
आज उसी की कड़वी बोली से
मन फूट-फूट कर रोता है।
अनाथ बने अनजान सड़क पे
भटकता एक मुसाफिर।

लाख सताओ मुझे मेरे लाल
हमें तनिक न होता मलाल
आंसू आते तेरे नीच विचार पे
कठोर-कुटिल व्यवहार पे
दिल पिता का कभी तुझे
ना देगा बद्दुआ कभी तुझे।
खुश रहे तू यों ही
गा रहा हूँ बंजारा बनकर।
मैं बेबस अनजान सड़क पे
भटकता एक मुसाफिर।

कवि : बसंत लाल 'चमन'

November 4, 2008

भारतीय संस्कृति का प्रतीक पर्व छठ

भारतीय संस्कृति का प्रतीक पर्व छठ

हमारा देश भारत विविध संस्कृतियों का अनुपम राष्ट्र है। किसी भी देश की संस्कृति का उदय अकस्मात नहीं होता है अपितु परम्परागत मान्यताओं, आस्थाओं और जीवन-मूल्यों के आधार पर होता है। धर्म संस्कृति का आवश्यक अंग होने के कारण अनेक पवित्र कर्मों को उत्पन्न करता है। पर्व-त्यौहार संस्कृति के जिवंत प्रमाण है।
कोई त्यौहार पुरे देश में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है तो कोई केवल सिमित स्थान में ही जनप्रिय होता है। जैसे - होली, दशहरा, दिवाली जहाँ व्यापक रूप से पुरे देश में मनाया जाता है तो वहीँ तमिलनाडू के पोंगल, पंजाब का बैशाखी, बिहार का छठ पर्व अपने-अपने क्षेत्र में लोकप्रिय है।
बिहार का छठ पर्व अपने-आप में एक अनूठा पर्व है। यह विशेषकर हिन्दुओं का पर्व है। इस पर्व में बच्चे-बुढे, महिला-पुरूष सबों का सामंजस्यपूर्ण बर्ताव सामाजिक एकता की कड़ी को नई जीवन देती है। महीनों पहले से ही ईसकी तैयारी शुरू हो जाती है।
छठ पर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से होता है। चतुर्थी के दिन व्रती (महिला - पुरूष) पवित्रता पूर्वक स्नान करके कद्दू-भात का भोजन करते हैं। तत्पश्चात छठी मैया के व्रत का सिलसिला शुरू होता है। पंचमी के रोज 'खरना' की पूजा होती है जिसमें गुड़-खीर का भोग लगाया जाता है और अड़ोस-पड़ोस सबों को प्रसाद बाँटा जाता है। षष्ठी के रोज व्रती नदी किनारे डाला सजा के फल-फूल-नैवेद्य वगैरह के साथ संध्या काल में डूबते हुए भगवान भास्कर को अर्ध्य समर्पित करते हैं। पुनः सप्तमी के रोज उगते हुए भगवान् सूर्य को नदी किनारे अर्ध्य देते है। इस प्रकार छठ पर्व का कार्यक्रम सम्पन्न होता है।
त्यौहार देशव्यापी हो या क्षेत्रीय हो, ये हमारी जीवनचर्या को किन्हीं न किन्हीं रूपों में प्रभावित करती है। हमारी संस्कृति के आधारभूत तत्त्व धार्मिक सिद्धांत, सामाजिक परम्पराएं और जीवन-दृष्टिकोण की नींव पर खड़ी है। इस नींव को इस आधार को सतत सुदृढ़ता प्रदान कराए रहने में छठ पर्व का अतुलनीय योगदान सदा से रहा है। अपनों के बीच सबसे बड़ी चीज जो हमें छठ पर्व देती है वह है - परस्पर मेल-मिलाप की भावना का। सभी एक-दुसरे के कामों में हाथ बंटाने को तत्पर दीखते हैं। कहीं भी किसी से भी छोटी से छोटी भी गलती न हो जाए इसका बड़ा ख्याल रखते है। हमेशा एक-दुसरे को प्रोत्साहित करने को आतुर रहते हैं।
इतने सारे सदगुणों-सद्व्यव्हारों-सदाचरणोँ जैसी भावनाओं का विकास ख़ुद-ब-ख़ुद छठ पर्व के शुभागमन से हो जाता है। कहाँ तक कहें, छठ पर्व हमें परस्पर एकता, एकरसता, एकरूपता और एकात्मकता का पाठ पढाते हैं। और यही हमारी संस्कृति की आधारशिला है।
संक्षेपतः छठ पर्व जहाँ एक ओर भारतीय संस्कृति की कड़ी को मजबूती प्रदान करती है वहीँ दूसरी ओर सौहार्द्रता, सहिष्णुता, एक-सूत्रता और राष्ट्रीयता के साथ मानवता का सुखद संदेश देते हुए हमें और अधिक सभ्य और संस्कृतिवान बनाने के लिए सन्मार्ग भी दिखाती है। अतः आएं इस वर्ष के छठ पर्व को भी हम भारतीय संस्कृति के प्रतीक-पर्व के रूप में हर्षोल्लास पूर्वक मनाएँ।

लेखक : बसंत लाल 'चमन', पटना, बिहार
http://nagmechaman.blogspot.com/
E-mail ID : gulbdan@gmail.com

महेश कुमार वर्मा, पटना , बिहार
http://popularindia.blogspot.com/
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com

September 21, 2008

रमजाने-पैगाम

रमजाने-पैगाम

रमजाने-पैगाम याद रखना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
आयतें उतरी जमीं पे जिस रोज,
अनवरे-इलाही आयी उस रोज;
इनायत खुदा की न कभी भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
खयानत का ख्याल तू दिल से निकाल दे,
खुदी को मिटा खुदाई में तस्लीम कर दे;
क़यामत के कहर में भी ये कलाम न छोड़ना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
अदावत का गुल ना खिल पाये कभी,
हबीबों की हस्ती ना हिल पाये कभी;
जुर्मों की जहाँ से सदा परहेज करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
पीर-फकीर, मौलाना हुए इसी राह पे चलकर,
उतारा आयतों को दिल में जुल्मों-सितम सहकर;
हर मर्ज की दवा है, वल्लाह , ना भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
हम हैं नूर खुदा के, सबसे प्यारे हैं खुदा के,
मोमिनों अहिंसक बनो, कह गए पैगम्बर सबसे;
जख्म ना पाये कोई जीव हमसे, सदा रहम करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥


रमजान मुबारक



गीतकार : बसंत लाल 'चमन'
E-mail ID : gulbdan@gmail.com

September 14, 2008

रिश्ता

रिश्ते कहते है किसको
अब तक समझ न पाया
रिश्तो के रेलमपेल में
बस स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आया ।
जग ने पाया क्या
बना के रिश्तों की लड़ियाँ
मिल न सका कभी आपस में
संबंधो की बेमेल कड़ियाँ ।
तू मेरा है मै तेरा हूँ
बस इतना कहना ही क्या रिश्ता है ?
संग न चल पाता दो पग भी
हाय ! ये कैसा रिश्ता-नाता है ।
क्या करूँ कवायद इन रिश्तों की
रूप इनके है बड़े निराले
देते तोहफे कामयाबी के कहीं
तो बरसाते कहीं हार के पाले ।
रिश्तो की गहराई का अब तक
थाह ना ले पाया है कोई
अपनापन का मुखौटा पहने
शोषण करता है हर कोई ।
साधू हो या दुर्जन कोई
मतलब के रिश्ते निभाते है
दिल की चंद खुशी के खातिर
रिश्तो का बलिदान चढाते है ।
रिश्तो के चक्रव्यूह में फँसकर ही
आज "चमन "का ये हाल है
अपना-अपना कहके सबने लुटा
अपनी हस्ती ही यारों बदहाल है ।।

August 9, 2008

अल्लाह की असलियत

हर शाम मयखाने को सलाम करता हूँ।

जब तलक न आती तेरा कलाम याद करता हूँ॥

पैमाने हैं वही रिन्दाना बदल गया है।

छलकाते है जाम और तेरा पैगाम याद करता हूँ॥

मौसम तो वही है मिजाज ही ख़राब है।

गर्दिशे-जिंदगी में भी तेरा पयाम याद करता हूँ॥

कभी लगता है संसार ही मयखाना है।

वस्ले मिलन की वह मुस्कान याद करता हूँ॥

अल्लाह की असलियत मयकदा ही बताती है।

इजहारे इश्क की गुजरी शाम याद करता हूँ॥

हर शाम मयखाने को सलाम करता हूँ।

जब तलक ............ ॥

ये नीरव निस्तब्ध रात!

ये नीरव निस्तब्ध रात!
छाया है अंधकार का साम्राज्य,
चंचलताएँ सभी हैं त्याज्य।
मूढ़ जग! जड़ता में विलीन होने जा रही आज
ये नीरव निस्तब्ध रात!
रोते बच्चे करते कोलाहल
माँ कहती चुप हो जा पागल,
प्रलय-प्रभात से अनजान, सो रहा सारा समाज।
ये नीरव निस्तब्ध रात!
काल के क्रूर-कृत्यों को सोच
प्रकृति हो गई है खामोश,
रे हतभाग्य मानव! जाग! आ रहा महाकाल, कर एहसास।
ये नीरव निस्तब्ध रात!

कवि : बसंत लाल "चमन"

कजरारे नयना

बीती शाम ना आ सका नजरों पे आपके
गुस्ताखी हुई, मंजूरे-सजा होगी मिले जो हाथों से आपके।
तड़प थी दिल में तेरा दीद ना हो सका
कजरारे नयनों की दरिया में उतर ना सका।
रात सारी रोता रहा यादों में आपके॥
सेज मखमली चुभती रही काँटों की तरह
रात कटी जुस्तजू में तेरी जोगन की तरह
मयकदे शोक मनाती रही मुन्तजिर में आपके॥
आग उल्फत की जलती रही शब सारी
एहसास ना हुई किसी को दर्द की हमारी।
सहर हुई शुकुँ मिली पिलायी शराब ऐसी लबों की आपने॥
चमन चहकने लगी देख गुंचे को खिलते हुए
महफिल सँवरने लगी देख नजरों को मिलते हुए।
एक बिजली सी गिरी बज्म में घूँघट यूँ उठे शवाब के॥

गीतकार : बसंत लाल "चमन"

पहली ख्वाहिश

चाहत में तेरी जहर जहाँ का मुझे मंजूर है
गर तू ना मिली अकाले-अजल भी मुझे मंजूर है।
परेशां किए हैं बहुत ज़माने के रिश्तों ने
मिल जाए सहारा गर तेरा तो हर सितम मुझे मंजूर है।
जुल्म दुनिया का अब जब्त नहीं होती यारा
जरुरत है बस तेरी फिर तो हर जखम मुझे मंजूर है।
नहीं है ऐसा गुलशन कोई रो भी लूँ जहाँ जरा बैठ के
ओ बैरागन क्यूँ रूठी हो यूँ ये कैसी तेरी दस्तूर है।
आ जाओ एकबार सामने तू धो लूँगा नयनों को इसी बहाने
जख्म-जख्म ना रहा कोई हर दर्द बन गए नासूर हैं।
पहली ख्वाहिश थी मेरी तू आखिरी ख्वाहिश भी हो तुम ही
विदाई है ये आखिरी चमन तेरी खामोशी की हर सजा मुझे मंजूर है॥

गीतकार : बसंत लाल "चमन"

February 13, 2008

हुई दीदार उनकी कल मुझे

थी आरजू जिस महज़बी कि मुझे
हुई दीदार उनकी कल मुझे

मृगनयनी ने फेरी नजर इस तरह
सपने सच होते नजर आये मुझे
थी आरजू जिस महज़बी ........

शरारत निगाहों कि लगे जब मचलने
जरुरत जाम कि लगने लगी बेकार मुझे
थी आरजू जिस महज़बी.........

संभाला बड़ी मुश्किल से खुद को
थी वो बगल में खड़ी महसूस हुआ मुझे
थी आरजू जिस महज़बी .......

देखा उसे गिराते बिजलियाँ तब्बसुम कि
फरिश्ते भी चूमते पाँव नजर आये मुझे
थी आरजू जिस महज़बी ........

चमन को बसंत से भला क्या शिकवा
खोये हम भी आगोश में एहसास हुआ मुझे
थी आरजू जिस महज़बी ........
हुई दीदार उनकी कल मुझे
हुई दीदार उनकी....
हुई दीदार उनकी......

February 12, 2008

बरसाती बदन

अधर कर रही अमृतपान सखे
शितलता कि बौछार करती
मंद मृदु मुस्काने छेरती
कर उलझाये गेसू में कर रही मदपान सखे
अधर कर रही अमृतपान सखे

पलके झुका मधु पिलाती
बज्म में इक मदहोशी लाती
तिरछी चितवन करती घायल हो रही विषपान सखे
अधर कर रही अमृतपान सखे

शोख अदाएं संभल न पाए
उमरती तरुनाई पे शरम न आये
बरसाती बदन कि शोला कर रही बदनाम सखे
अधर कर रही अमृतपान सखे

January 26, 2008

नया साल मुबारक

नया साल मालामाल हो
रूखे-रोशन पे मलाल हो
लाइफ में तेरी न कोई सवाल हो
ये साल तेरे लिए सबसे जियादा खुशगंवार हो